नई दिल्ली | संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की सिविल सेवा परीक्षा 2025 के नतीजों के बाद आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) आरक्षण को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ गई है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस कोटे का लाभ उन उम्मीदवारों ने भी उठाया है, जिनकी आर्थिक पृष्ठभूमि कमजोर नहीं है।
EWS कोटे के लाभार्थियों पर उठे सवाल
मोदी सरकार ने 2019 में सामान्य वर्ग के गरीबों को 10% आरक्षण देने के लिए EWS कोटा लागू किया था। इसका उद्देश्य आर्थिक असमानता को दूर करना था।
हालांकि, सिविल सेवा परीक्षा 2025 में EWS कोटे से चयनित 104 उम्मीदवारों के विश्लेषण से चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।
एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इन 104 सफल उम्मीदवारों में से कम से कम 67 ने दिल्ली और अन्य शहरों के महंगे कोचिंग संस्थानों में पढ़ाई की, जहाँ की सालाना फीस 2.5 लाख रुपये से भी अधिक है।
महंगी शिक्षा और अच्छी नौकरियां
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इनमें से कई उम्मीदवार IIT और दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़े हैं।
कम से कम 46 उम्मीदवारों ने एनसीआर और अन्य राजधानियों के बड़े निजी स्कूलों से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की।
इतना ही नहीं, कुछ चयनित उम्मीदवार पहले मल्टीनेशनल कंपनियों में अच्छी सैलरी पर काम कर चुके हैं, जो उनकी मजबूत आर्थिक स्थिति को दर्शाता है।
आरक्षण का दोहरा पहलू
हालांकि, इसी सूची में कुछ ऐसे उम्मीदवार भी हैं जो वास्तव में इस योजना के हकदार हैं। इनमें एक सुरक्षा गार्ड का बेटा, एक स्कूल बस कंडक्टर का बेटा और एक रेलवे कुली की बेटी शामिल है, जिन्होंने अपनी मेहनत से यह मुकाम हासिल किया है।
लोगों का कहना है कि अगर अच्छी आर्थिक स्थिति वाले लोग इस फायदे को हथिया लेते हैं, तो EWS आरक्षण का पूरा मकसद ही खत्म हो जाएगा।
इस खुलासे के बाद सोशल मीडिया पर EWS प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं। मांग की जा रही है कि पात्रता की जांच को और अधिक पारदर्शी और सख्त बनाया जाए ताकि इसका लाभ केवल जरूरतमंदों तक ही पहुंचे।
यह विवाद EWS आरक्षण नीति के कार्यान्वयन में मौजूद खामियों को उजागर करता है। यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि आर्थिक न्याय का यह उपकरण अपने मूल उद्देश्य से न भटके और सही लाभार्थियों को सशक्त करे, न कि पहले से ही संपन्न लोगों को अतिरिक्त लाभ पहुंचाए।
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