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भारत

चुनाव आयोग का SIR सही: सुप्रीम कोर्ट: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के SIR को सही ठहराया, याचिका खारिज

Pradeep Beedawat

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग का SIR कराना कानूनी अधिकारों के दायरे में है।

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HIGHLIGHTS

  • सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया को कानूनी तौर पर सही ठहराया।
  • बिहार में SIR के बाद मतदाताओं की संख्या 6% घटकर 7.42 करोड़ रह गई।
  • कोर्ट ने आधार को मतदाता पहचान के लिए 12वें दस्तावेज के रूप में मान्यता दी।
  • विपक्ष ने इस प्रक्रिया के समय और मंशा पर गंभीर सवाल उठाए थे।
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नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग द्वारा कराई जा रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया पर अपनी मुहर लगा दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग ने अपने कानूनी अधिकारों के भीतर ही काम किया है।

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, केवल इसलिए SIR को गैरकानूनी नहीं माना जा सकता क्योंकि यह सामान्य तौर पर होने वाली प्रक्रिया से अलग है। कोर्ट ने इस मामले में दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया है।

विपक्षी नेताओं की याचिकाएं और उनके तर्क

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और PUCL जैसे संगठनों ने इस प्रक्रिया को चुनौती दी थी। इनके साथ विपक्षी पार्टियों के कई दिग्गज नेता भी इस कानूनी लड़ाई में शामिल थे।

याचिकाकर्ताओं में मनोज झा, योगेंद्र यादव, महुआ मोइत्रा और के सी वेणुगोपाल जैसे नाम शामिल थे। उन्होंने बिहार में शुरू की गई SIR प्रक्रिया की वैधता पर गंभीर सवाल खड़े किए थे।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि जिस तरीके और पैमाने पर विधानसभा चुनावों से ठीक पहले यह प्रक्रिया की गई, उससे लाखों लोगों के नाम वोटर लिस्ट से कट गए।

नागरिकता जांच पर उठे सवाल

विपक्ष ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग एक नागरिकता जांच करने वाली संस्था की तरह काम कर रहा है। उनका कहना था कि मतदाता सूची सुधार के नाम पर लोगों को परेशान किया गया।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, SIR ने पहले से रजिस्टर्ड मतदाताओं पर खुद को नागरिक साबित करने की जिम्मेदारी डाल दी। उन्होंने कहा कि नागरिकता तय करने का अधिकार केवल सरकार के पास है।

चुनाव आयोग का पक्ष और संवैधानिक दायित्व

चुनाव आयोग ने कोर्ट में अपनी प्रक्रिया का मजबूती से बचाव किया। आयोग ने कहा कि चुनाव की स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना उसका सबसे बड़ा संवैधानिक दायित्व है।

आयोग की दलील थी कि मतदाता सूची में सुधार के लिए SIR बेहद जरूरी है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि केवल वास्तविक भारतीय नागरिक ही लोकतंत्र के महापर्व में मतदान कर सकें।

आयोग केवल चुनावी उद्देश्यों के लिए नागरिकता का सत्यापन कर रहा था, इसका मकसद किसी की कानूनी नागरिकता तय करना नहीं है।

बिहार में SIR के चौंकाने वाले आंकड़े

बिहार में 1 अक्टूबर 2025 को SIR की फाइनल लिस्ट जारी की गई थी। इसके बाद राज्य में वोटर्स की कुल संख्या में 6% की भारी गिरावट दर्ज की गई।

आंकड़ों के मुताबिक, बिहार में वोटर्स की संख्या घटकर अब 7.42 करोड़ रह गई है। फाइनल लिस्ट से लगभग 69.29 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं।

हालांकि, इस प्रक्रिया के दौरान 21.53 लाख नए मतदाताओं को जोड़ा भी गया। जून 2025 में बिहार में कुल 7.89 करोड़ मतदाता थे, जो अब काफी कम हो चुके हैं।

वोटर लिस्ट से नाम हटने के मुख्य कारण

नई लिस्ट के विश्लेषण से पता चला है कि 22.34 लाख लोग मृत पाए गए। वहीं, 6.85 लाख लोगों के नाम दो अलग-अलग जगहों पर दर्ज मिले, जिन्हें हटाया गया।

इसके अलावा, 36.44 लाख लोग ऐसे पाए गए जो अपनी पुरानी जगह छोड़कर दूसरी जगह शिफ्ट हो चुके हैं। पटना जिले में मतदाताओं की संख्या में 1.63 लाख की वृद्धि हुई।

दूसरी ओर, सारण जिले में 2.24 लाख मतदाताओं के नाम काटे गए। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि SIR प्रक्रिया का असर अलग-अलग जिलों में भिन्न-भिन्न रहा है।

आधार कार्ड को मिली 12वें दस्तावेज के रूप में मान्यता

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण निर्देश दिया। कोर्ट ने आधार नंबर को पहचान के लिए 12वें मान्य दस्तावेज के रूप में स्वीकार करने का आदेश दिया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आधार पहचान का प्रमाण पत्र है, नागरिकता का नहीं। चुनाव आयोग को निर्देश दिया गया कि वे मतदाताओं की पहचान के लिए आधार का उपयोग करें।

बिहार में 2003 के बाद पहली बार इस तरह की गहन जांच प्रक्रिया चली। इसे 24 जून 2025 को शुरू किया गया था, जिसका उद्देश्य फर्जी मतदाताओं को बाहर करना था।

विपक्ष का विरोध और भविष्य की चिंताएं

विपक्ष का आरोप है कि यह प्रक्रिया लोगों को वोटिंग के अधिकार से वंचित करने की एक बड़ी साजिश है। वे टाइमिंग पर लगातार सवाल उठा रहे हैं।

नेताओं का कहना है कि अगर SIR की जरूरत थी, तो इसे चुनाव के बाद भी किया जा सकता था। इतनी हड़बड़ी में इसे लागू करने के पीछे की मंशा संदिग्ध है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने अब चुनाव आयोग की शक्तियों को और स्पष्ट कर दिया है। यह फैसला आने वाले समय में अन्य राज्यों की चुनावी प्रक्रियाओं को भी प्रभावित करेगा।

निष्कर्ष के तौर पर, कोर्ट ने आयोग की स्वायत्तता को बरकरार रखा है। हालांकि, वोटर लिस्ट से बड़ी संख्या में नाम हटने का मुद्दा राजनीतिक गलियारों में गरमाता रहेगा।

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