जयपुर | राजस्थान में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की 'जीरो टॉलरेंस' नीति का असर एक बार फिर देखने को मिला है। सरकार ने प्रशासनिक तंत्र को चुस्त-दुरुस्त बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए अनुशासनहीन अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की है।
मुख्यमंत्री ने लंबे समय से लंबित पड़े 19 विभागीय जांच के मामलों का निपटारा कर दिया है। इस फैसले से प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है।
प्रशासनिक तंत्र में 'ऑपरेशन क्लीन'
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने इन मामलों की गहन समीक्षा के बाद यह कड़ा फैसला लिया है। इस कार्रवाई के तहत काम में लापरवाही बरतने वाले कई सेवारत और सेवानिवृत्त अधिकारियों पर गाज गिरी है।
सरकार का यह कदम उन अधिकारियों के लिए एक स्पष्ट संदेश है जो अपने कर्तव्यों का पालन ठीक से नहीं करते हैं। इस फैसले का उद्देश्य प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
सेवारत अधिकारियों पर गिरी गाज
आधिकारिक जानकारी के अनुसार, मुख्यमंत्री ने 4 सेवारत अधिकारियों के खिलाफ लगे प्रशासनिक लापरवाही के आरोपों को सही पाया।
इसके बाद राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1958 के नियम 16 के तहत इन सभी दोषी अधिकारियों की भविष्य में होने वाली वार्षिक वेतन वृद्धि को रोकने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है।
इस अनुशासनात्मक कार्रवाई का सीधा असर इन अधिकारियों के करियर और भविष्य के प्रमोशन पर पड़ना तय है।
रिटायरमेंट के बाद भी नहीं मिली राहत
भजनलाल सरकार की इस कार्रवाई की सबसे खास बात यह है कि सेवानिवृत्त हो चुके अधिकारी भी अपनी पुरानी गलतियों की सजा से नहीं बच पाए हैं।
मुख्यमंत्री ने 7 अलग-अलग प्रकरणों की समीक्षा की, जिनमें 8 सेवानिवृत्त अधिकारी जांच के दायरे में थे। इन सभी के खिलाफ लगे आरोप सही पाए गए।
सरकार का संदेश साफ है - काम में लापरवाही और अनुशासनहीनता किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
इसके बाद मुख्यमंत्री ने इन सभी 8 रिटायर्ड अधिकारियों की पेंशन में आनुपातिक कटौती करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। यह कदम पेंशनभोगियों के लिए भी एक चेतावनी है।
कुछ को राहत, कुछ को नहीं मिली माफी
इन 19 मामलों के निपटारे के दौरान कुछ अधिकारियों द्वारा दायर की गई पुनरावलोकन याचिकाओं पर भी विचार किया गया।
मुख्यमंत्री ने 4 प्रकरणों में दिए गए दंड को यथावत रखा, जिससे इन अधिकारियों को कोई राहत नहीं मिली। हालांकि, एक मामले में मानवीय आधार पर दंड में आंशिक संशोधन किया गया।
वहीं, न्याय सुनिश्चित करते हुए एक भारतीय वन सेवा (IFS) के अधिकारी को बड़ी राहत दी गई। इसके अलावा, 2 अन्य मामलों में 4 अधिकारियों को सबूतों के अभाव में दोषमुक्त कर दिया गया।
मुख्यमंत्री के इस फैसले ने एक तरफ जहां लापरवाह अधिकारियों को कड़ा संदेश दिया है, वहीं निर्दोष अधिकारियों को न्याय भी दिलाया है। यह कदम राजस्थान में एक जवाबदेह प्रशासनिक माहौल बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।
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